Sunday, 2 September 2018

...और खेलों इंडिया

     
Picture Credit- Sportskeeda
इंडिनेशिया में चल रहे 18वें एशियन खेलों का सफल आयोजन कल सम्पन्न हो गया। भारतीय खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन पर हम सभी भारतीय निसन्देह गौरवांन्वित हैं। और हो भी क्यूँ ना, भारतीय खिलाड़ियों ने 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदक सहित कुल 69 पदक
 के साथ तालिका में 8वें स्थान पर रहते हुए एशियन खेलों में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जो किया है। लेकिन, सवा अरब की जनसंख्या वाले देश के लिए क्या ये काफी है ? नहींइस पदक तालिका में हमसे ऊपर ऐसे कई देश है जो जनसंख्या ही नहीं, संसाधन और समृधि में भी हमारें आस-पास नज़र नहीं आते। फिर क्या वज़ह है जो खेल संस्कृति में हम इनसे पीछे रह गए ?

   बचपन से ही एक कहावत हमारे ऊपर गधे पर बोझ की तरह डाली जाती है, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब। मतलब बिल्कुल साफ है, बचपन से ही हमारा स्वर्णिम भविष्य जबरन हमें पढ़ाई-लिखाई में दिखाया जाता है। खेल-कूद सिर्फ़ मनोरंजन का रुप हो सकता है, कैरियर नहीं, ऐसी सोच दुर्भाग्यवश अभी भी जीवित है। मैं तो इसे विडंबना ही कहूंगा कि देश की प्रतिभाओं को अपने प्रतियोगी से पहले अपने परिवार और रुढ़िवादी समाज़ से भिड़ना पड़ता है। लेकिन शुक्र है, अब धीरे-धीरे सोच और प्रदर्शन दोनों में सकारात्मक बदलाव दिख रहें हैं।

   एक खिलाड़ी का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हो जाता, सबसे बड़ी समस्या सिस्टम से लड़े बिना कहां उसे मंजिल मिलने वाली है। लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के खेल में उलझे ये अधिकारी बाकी खेलों पर ध्यान ही नहीं दे पाते। ऐसी स्थितियों में या तो प्रतिभाएं दम तोड़ देती है या स्पॉन्सर्स के लिए निजी कम्पनियों का रुख करती है। बाद में येही खिलाड़ी जब पदक जीतकर लातें है तो उन पर इनामों की बरसात होती है। सुविधा और संसाधनों की यही बरसात यदि केन्द्र और राज्य सरकारें पूर्व में करे तो ये खिलाड़ी 1 नहीं 4 पदक जीतकर लाएं।

    एशियन और राष्ट्रमंडल खेलों के अलावा ओलंपिक के आंकड़े तो वैश्विक पटल पर साझे करने योग्य भी नहीं। आलम ये है कि 2012 और 2016 के ओलंपिक खेलों में भारतीय दल एक भी स्वर्ण नहीं जीत सका। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा के स्वर्ण जीतनें के बाद चीन के एक अखबार में इससे जुड़ी एक खबर प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था – “ A nation of billions people wins its first gold”. ये लाइन भारतीयों को धरती दिखाने के लिए काफी है।

      मतलब साफ है कि हमें अभी और खेलने की जरुरत है। जरुरत है देश में उपजे खेलों के बीजों को रोपने की और उनको स्कूली स्तर से ही संवारने की। जरुरत है मीड़िया की सकारात्मक भागीदारी की। जरुरत है वर्तमान खेलमंत्री जैसे और मंत्रियों की जो एक स्पॉटब्वॉय की तरह खिलाड़ियों की सेवा में लगा हो। अब सचमुच जरुरत है कि सिस्टम खेलों से ना खेलकर, खिलाड़ियों का खिलाएं।  

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