आधुनिकरण की आरी से हम प्रकृति की उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर हम स्वयं बैठे हैं। वो दिन दूर नहीं जब इस डाल से गिरकर मानव-जाति आक्सीजन रहित वायु को चीरते हुए, विनाश के उस सूखे गहरे जलकुंड में जा गिरेगी जिसके तल पर विशाल ज्वालामुखी धधक रहे हैं।
(All Rights are reserved for this content)
(All Rights are reserved for this content)
No comments:
Post a Comment