रिश्तों की मेज़ पर परिवार एक किताब तो दोस्ती एक डायरी की तरह होती है, जिसके पन्नों पर हम मर्ज़ी की कलम में भावनाओं की स्याही भरके जो मन चाहे लिखते है। ये पन्ने सालों बाद भी जब खुलते है तो यादों की वो ख़ुशबू छोड़ जाते है जिसका नशा पन्नो को फिर से इकट्ठा करके उनपर लिखने को कहता है ।
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